भारत की भौगोलिक पहचान में अरावली पर्वत श्रृंखला का नाम बेहद खास है। हाल के वर्षों में अरावली एक बार फिर सुर्खियों में है—कभी अवैध खनन के कारण, तो कभी पर्यावरण संरक्षण की मुहिम की वजह से। लेकिन इन चर्चाओं के बीच एक सवाल अक्सर लोगों के मन में आता है: अरावली की पहाड़ियां आखिर कितनी पुरानी हैं और क्यों इन्हें बचाना इतना ज़रूरी है?
भारत की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखला
अरावली पर्वत श्रृंखला को भारत ही नहीं, बल्कि पृथ्वी की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में से एक माना जाता है। भूवैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार, अरावली का निर्माण करीब 2.5 से 3 अरब साल पहले हुआ था। तुलना करें तो हिमालय मात्र 4–5 करोड़ वर्ष पुराना है। यही वजह है कि अरावली की संरचना आज अपेक्षाकृत नीची और घिसी हुई दिखाई देती है।
कहां से कहां तक फैली है अरावली?
अरावली पर्वत श्रृंखला का विस्तार गुजरात से शुरू होकर राजस्थान होते हुए दिल्ली तक है। दिल्ली में स्थित रायसीना हिल्स को अरावली का सबसे उत्तरी छोर माना जाता है। यह पर्वत श्रृंखला पश्चिमी भारत के विशाल क्षेत्र को प्राकृतिक ढाल की तरह सुरक्षा देती आई है।
कितनी लंबी है अरावली पर्वत श्रृंखला?
अरावली की कुल लंबाई लगभग 692 किलोमीटर है। इसका सबसे ऊंचा शिखर गुरु शिखर है, जो माउंट आबू में स्थित है। गुरु शिखर की ऊंचाई लगभग 1,722 मीटर है।
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कैसे हुआ अरावली का निर्माण?
भूवैज्ञानिक दृष्टि से अरावली का निर्माण पृथ्वी के प्रारंभिक काल में हुआ, जब बुंदेलखंड क्रेटॉन और मारवाड़ क्रेटॉन जैसी प्राचीन भू-खंड संरचनाएं आपस में टकराईं। इस टकराव के कारण धरती की ऊपरी परत में दबाव बना और चट्टानें ऊपर की ओर उठ गईं। इसी प्रक्रिया से अरावली का जन्म हुआ।
क्यों कहलाती है अरावली ‘वलित पर्वत’?
टकराव के दौरान चट्टानों में मोड़ (फोल्ड) पड़ गए, इसलिए अरावली को वलित पर्वत (Folded Mountain) कहा जाता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि अपने शुरुआती दौर में अरावली की ऊंचाई भी हिमालय जैसी रही होगी, लेकिन करोड़ों वर्षों के क्षरण ने इसे काफी हद तक समतल कर दिया।
अरावली में पाए जाने वाले खनिज
अरावली क्षेत्र में प्राचीन ज्वालामुखीय गतिविधियों के कारण यहां खनिजों की भरमार है। यहां प्रमुख रूप से:
- तांबा
- सीसा
- जस्ता
जैसे खनिज पाए जाते हैं। यही कारण है कि यह क्षेत्र लंबे समय से खनन गतिविधियों का केंद्र बना हुआ है।
समय के साथ क्यों घटती गई अरावली?
अरावली पर्वत श्रृंखला पर हवा, पानी और तापमान का प्रभाव करोड़ों वर्षों तक पड़ता रहा। इससे चट्टानों का क्षरण होता गया और पहाड़ियां धीरे-धीरे नीची होती चली गईं। लेकिन हाल के दशकों में अवैध खनन, शहरीकरण और जंगलों की कटाई ने इस प्राकृतिक क्षरण को कई गुना तेज कर दिया है।
क्यों ज़रूरी है अरावली का संरक्षण?
अरावली सिर्फ पहाड़ों की श्रृंखला नहीं है, बल्कि: यह राजस्थान को मरुस्थल बनने से रोकती है, भूजल स्तर बनाए रखने में मदद करती है, दिल्ली-एनसीआर के लिए ग्रीन लंग्स की तरह काम करती है। अगर अरावली का क्षरण ऐसे ही जारी रहा, तो इसका असर जल संकट, प्रदूषण और जलवायु असंतुलन के रूप में सामने आ सकता है।
निष्कर्ष
अरावली पर्वत श्रृंखला भारत की भूवैज्ञानिक विरासत है, जो अरबों सालों के इतिहास को अपने भीतर समेटे हुए है। आज जब यह श्रृंखला खतरे में है, तो इसे बचाना सिर्फ पर्यावरण की नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की जिम्मेदारी भी है। अरावली को बचाना मतलब भारत की प्राकृतिक ढाल को बचाना।
